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क्या भगवान राम की कोई बहन थी?

एक भूली हुई कथा का आलोक


जब-जब हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का नाम लेते हैं, तब हमारे मन में अयोध्या की नगरी, माता कौशल्या की गोद, और चारों भ्राताओं का मधुर स्नेह उभर आता है। परंतु इस दिव्य गाथा के मध्य एक ऐसा नाम भी है, जो चंद्रमा की तरह शांत है, और जिसकी रोशनी में रामायण का भाग्य लिखा गया था । वही थीं – देवी शांता, श्रीराम की ज्येष्ठ बहन।

जन्म – अयोध्या की कोमल कलिका


अयोध्या के महल में जब देवी शांता का जन्म हुआ, तो पूरी अयोध्या जैसे प्रेम और आनंद में डूब गई। वह कौशल्या की आँखों की पुतली थीं, दशरथ के हृदय की शांति। उनकी मुस्कान से राजमहल के गलियारे खिल उठते, और उनकी बाल लीलाओं से अयोध्या के हर कोने में मधुरता घुल जाती।
कहते हैं, जब वह वीणा छेड़तीं, तो पक्षी भी गाना भूल जाते, और जब वह वचन बोलतीं, तो समस्त वेदों की ध्वनि उसमें झलकती थी।

त्याग – एक पिता का वचन, एक पुत्री का समर्पण


समय का प्रवाह स्थिर नहीं रहता। एक दिन अयोध्या में कौशल्या की बहन, वर्षिणी, अपने पति राजा रोमपद के साथ आईं। उनके चेहरे पर अपूर्णता की हल्की छाया थी, संतानहीन होने की पीड़ा।
राजा दशरथ ने जब यह जाना, तो उन्होंने एक दिव्य निर्णय लिया –
“बहन, यदि तुम्हें संतान का सुख नहीं मिला, तो मेरी शांता अब तुम्हारी संतान होगी।”

उस क्षण, महल की दीवारों ने भी जैसे मौन साध लिया।
कौशल्या के नेत्रों से प्रेम और त्याग दोनों बह निकले।
शांता ने भी बिना किसी प्रश्न के, बिना किसी विरोध के, पिता के वचन को धर्म मानकर उस क्षण अपना जीवन समर्पित कर दिया।
वह मुस्कराईं – एक ऐसी मुस्कान, जिसमें अयोध्या का गौरव और एक स्त्री का तप दोनों झलक रहे थे।

विवाह – वह यज्ञ जिससे जन्मे थे श्रीराम


राजा रोमपद ने शांता का पालन ऐसे किया जैसे कोई अपनी आत्मा को पालता है।
वह बड़ी होकर ज्ञान, विनम्रता और सौंदर्य की मूर्ति बनीं।
उनका विवाह ऋषि श्रृंग से हुआ – वह महर्षि जिनकी तपस्या ने मेघों को वर्षा दी थी, और जिनके आशीर्वाद से धरती में उर्वरता लौटी थी।

और देखिए विधाता का विधान –
यही ऋषि श्रृंग आगे चलकर राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का संचालन करते हैं।
यही वह यज्ञ था जिससे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
अर्थात् यदि शांता न होतीं, तो श्रीराम का अवतार भी संभव न होता।
वह रामायण की वह छिपी कड़ी हैं, जिसने कथा को आरंभ दिया, पर स्वयं इतिहास के मौन में विलीन हो गईं।

शांता का अमरत्व


कहते हैं, हिमाचल की पवित्र घाटियों में आज भी श्रृंग ऋषि और देवी शांता के मंदिर में धूप की महक और घंटों की गूंज में वह कहानी सांस लेती है।
वहाँ की हवा जैसे अब भी कहती है –
“जहाँ त्याग है, वहीं राम हैं; जहाँ धर्म है, वहीं शांता ।”


उस मौन शक्ति को प्रणाम


श्रीराम ने धर्म की स्थापना की, पर उस धर्म का प्रथम दीपक जलाने वाली उनकी बहन शांता थीं।
वह न युद्ध लड़ीं, न वन गईं, न सिंहासन चाहा,पर उनका त्याग उस वृक्ष की जड़ है, जिससे अयोध्या का धर्म पुष्पित हुआ।

उनकी कथा हमें यह सिखाती है -कि कभी-कभी, जो इतिहास के कोने में मौन खड़े रहते हैं, वही सबसे बड़ा इतिहास रच जाते हैं।

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