क्या मन कि शांति तथा संतोष एक ही है? अगर नहीं तो इनमे क्या अन्तर है?

इस विषय पर आचार्यों द्वारा सुनाया गया एक गुरु शिष्य संवाद ही स्मरण में आता है l

एक बार पर्यंत के जंगलों में एक साधक रहता था, जिसका नाम था अद्वैत। उसका जीवन तपस्या और खोज से भरा हुआ था। उसने ग्रंथ पढ़े पहाड़ों पर ध्यान किया नदियों के किनारे मौन साधना की, पर उसके भीतर एक बेचैनी थी जैसे किसी शांत झील में भी हल्की सी लहरें रह जाएँ।

एक दिन वह अपने गुरु के पास गया और बोला, “गुरुदेव मैं शांति चाहता हूँ, मैं संतोष चाहता हूँ। क्या ये दोनों एक ही हैं?”

गुरु मुस्कुराए। बोले “नहीं पुत्र ये दो चरण हैं। पहला मन का विश्राम है, दूसरा आत्मा का परिपूर्ण होना।”

उन्होंने पास के उद्यान की ओर संकेत किया। वहाँ एक छोटा सा तालाब था। जल बिलकुल स्थिर मानो हवा तक ठहर गई हो। गुरु ने कहा “यह है मन की शांति। जब विचारों की लहरें थम जाती हैं जब भीतर का कोलाहल शांत हो जाता है तब मन वैसा हो जाता है जैसे यह जल। यह क्षणिक भी हो सकता है अगर कोई पत्थर फेंक दे तो फिर लहरें उठेंगी।”

फिर गुरु अद्वैत को थोड़ी दूर ले गए जहाँ एक किसान अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा था। दिन भर की मेहनत के बाद वह सादा रोटी और नमक खा रहा था पर उसके चेहरे पर अद्भुत मुस्कान थी। गुरु बोले “यह है संतोष। यह मन की शांति से भी गहरा है। यह वह अवस्था है जब हृदय कहता है ‘मुझे जो मिला वही पर्याप्त है।’ यह उस आत्मा की हँसी है जिसने अपनी इच्छाओं को साध लिया है।”

गुरु ने फिर कहा “पुत्र अपनी इच्छाओं को साधे बिना मन की शांति अपूर्ण है। जब तक इच्छाएँ नियंत्रण में नहीं आतीं, मन हर क्षण किसी न किसी दिशा में भागता रहता है। यह वैसा ही है जैसे किसी शांत झील में भीतर से बुलबुले उठते रहें। ऊपर से जल शांत दिखे पर भीतर उथल पुथल चलती रहे। इच्छाएँ अगर संयमित हों तो वे साधना बन जाती हैं, पर अगर अनियंत्रित हों तो वे शांति को निगल जाती हैं। मन की सच्ची शांति तभी आती है जब इच्छाएँ खुद थककर बैठ जाती हैं, जब हृदय कहता है ‘अब और नहीं चाहिए।’ तभी व्यक्ति भीतर से मुक्त होता है। वह बाहरी शोर में भी मौन सुनता है और उसी मौन में ईश्वर की झलक पाता है।”

गुरु ने आगे उदाहरण दिया “देखो उस नदी को” उन्होंने कहा “यह बह रही है शांत पर गतिशील। यही मन की शांति है। शांति का अर्थ जड़ता नहीं बल्कि संतुलन है। यह जानना कि कब रुकना है और कब बहना है।”

फिर उन्होंने आकाश की ओर देखा “अब ऊपर देखो वह चाँद। वह हर रात घटता बढ़ता है फिर भी उसे कोई शिकायत नहीं। वह जानता है कि उसका प्रकाश सूरज से आता है। यह है संतोष का प्रतीक। अपने अपूर्ण रूप में भी पूर्ण महसूस करना यही संतोष है।”

फिर गुरु ने तीसरा उदाहरण दिया “वह बच्चा देखो” उन्होंने कहा “जिसे मिट्टी में खेलते हुए देख रहे हो। वह राजा की तरह हँस रहा है क्योंकि उसके लिए मिट्टी ही स्वर्ण महल है। उसे कुछ और नहीं चाहिए। यही संतोष है। पर अगर वही बच्चा खेलते समय झगड़ता नहीं, रोता नहीं, बस ध्यान से घर बनाता रहता है तो वह अवस्था मन की शांति है।”

अद्वैत ने पूछा “तो क्या शांति और संतोष दोनों जरूरी हैं?” गुरु ने उत्तर दिया “हाँ पुत्र शांति तुम्हें अपने भीतर की ओर ले जाएगी और संतोष तुम्हें वहीं ठहराए रखेगा। शांति जल है संतोष उसका स्वाद। शांति ठहराव है संतोष तृप्ति है। शांति ध्यान की गहराई है संतोष प्रार्थना की मिठास।”

रात ढल चुकी थी। अद्वैत ने आँखें बंद कीं। पहले उसने अपने भीतर के विचारों को शांत किया जैसे किसी ने तूफानी समंदर पर हाथ रख दिया हो और लहरें खुद थम गई हों। फिर उसने भीतर से कहा “जो मिला वही पर्याप्त है।” उस क्षण उसे लगा मानो उसकी आत्मा में दो दीपक जल उठे हों एक शांति का दूसरा संतोष का।

और उस रात पहली बार अद्वैत को लगा कि उसने न केवल ईश्वर के पथ को पाया है बल्कि स्वयं को भी।

मन की शांति वह है जब विचारों के तूफान के बीच भी धैर्य का दीपक जलता रहे

और संतोष वह है जब उस दीपक की लौ तुम्हें मुसीबत, मुसीबत न लगने दे और मुसीबतों के बीच भी मुस्कुराने पर मजबूर कर दे
शांति तुम्हें मौन सिखाती है
संतोष तुम्हें मुस्कान
और जब इच्छाएँ साध ली जाती हैं तब दोनों मिलकर आत्मा को पूर्ण कर देती हैं

परन्तु इसका रास्ता गुरु, प्रभु, आचार्यों और नाम जप और आज्ञा पालन से होकर गुजरता है, जो साधक यह अभ्यास निरन्तर करता है, वह गुरु, प्रभु कृपा से ब्रम्हा को प्राप्त कर लेता है l

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