“जहाँ मृत्यु सोती है और मुक्ति जागती है – गया का दिव्य रहस्य” ?
गया – वह भूमि जहाँ आत्माएँ तृप्ति पाती हैं
बिहार की धरती पर, फल्गु नदी के शांत तट पर, एक ऐसा नगर बसता है जहाँ मृत्यु भी जीवन का उत्सव बन जाती है, उसी स्थान का नाम है – गया । यहाँ की मिट्टी में करुणा की सुगंध है, हवा में मुक्ति का संगीत। कहते हैं, जब कोई पुत्र यहाँ अपने पितरों के नाम तिल, जल और समी पत्र चढ़ाता है, तो आकाश के द्वार खुल जाते हैं, और आत्माएँ, जो अधूरी इच्छा लिए भटक रही थीं, दिव्य लोकों की ओर प्रस्थान करती हैं।
राम के चरणों से पवित्र हुआ गया
गया की महिमा का आरंभ त्रेतायुग से होता है। मंद प्रवाहमान फल्गु नदी के तट पर रामचंद्रजी खड़े हैं, सीता माता और लक्ष्मण उनके संग। उनके नेत्रों में भावुकता है, हृदय में पिता दशरथ के लिए कृतज्ञता। वह मुट्ठीभर तिल उठाते हैं, समी पत्र पर रखकर पवित्र जल से अर्पित करते हैं… और उसी क्षण, स्वर्ग में एक दीपक जल उठता है, दशरथ जी की आत्मा मोक्ष को प्राप्त करती है। तब से यह भूमि पवित्र कहलायी – जहाँ भगवान राम ने भी पिंडदान किया।
गयासुर की अद्भुत कथा – जब एक असुर बन गया तीर्थ
बहुत काल पूर्व, इस धरती पर एक असुर हुआ –गयासुर। पर वह वैसा असुर नहीं था जैसा हम कल्पना करते हैं। वह तपस्वी था, त्यागी था। उसने वर्षों तक ध्यान किया, और जब ब्रह्माजी प्रकट हुए, तो उसने वर माँगा – “हे प्रभु, मेरा शरीर इतना पवित्र हो जाए कि जो भी मेरे दर्शन करे, वह पापों से मुक्त हो जाए।” ब्रह्माजी ने वरदान दे दिया। पर परिणाम विचित्र हुआ, लोग पाप करने लगे, क्योंकि उन्हें पता था कि गयासुर के दर्शन से वे फिर से शुद्ध हो जाएंगे। धर्म की मर्यादा डगमगाने लगी।
देवताओं ने उपाय खोजा, उन्होंने यज्ञ करने के लिए गयासुर से एक पवित्र भूमि मांगी। गयासुर मुस्कराया और बोला – “इस पृथ्वी पर मुझसे पवित्र स्थान कोई नहीं। लो, मैं ही अपनी देह दे देता हूँ।” वह लेट गया, और उसका शरीर पाँच कोस तक फैल गया। वहीं भूमि आगे चलकर ‘गया’ नाम से प्रसिद्ध हुई।
देहदान के बाद भी गयासुर की करुणा अटूट रही। उसने देवताओं से प्रार्थना की – “हे देवगण! यह भूमि सदा लोक-तारिणी बनी रहे। जो यहाँ अपने पितरों के लिए श्राद्ध करे, उसे मुक्ति प्राप्त हो।” देवताओं ने आशीर्वाद दिया, और तभी से यह स्थान पितृमोक्षभूमि बन गया।
विष्णु स्वयं बने पितृदेव – गया का दिव्य रहस्य
आज भी गया के केंद्र में स्थित विष्णुपाद मंदिर में, भगवान विष्णु ‘गदाधर’ रूप में विराजमान हैं। कहते हैं, जब विष्णु भगवान ने गयासुर को आशीर्वाद दिया, तो उन्होंने अपना पावन चरण वहीं अंकित किया, जो आज भी फल्गु तट पर शिला में दिखाई देता है। वह पदचिह्न इस बात का प्रतीक है कि स्वयं भगवान ने इस भूमि को पितृमुक्ति के लिए चुना। यहाँ हर मंत्र, हर तिल, हर तर्पण, केवल एक कर्म नहीं – बल्कि आत्मा की यात्रा का एक पड़ाव है।
पितृमोक्ष की अंतिम सीढ़ी
गया में श्राद्ध करने के बाद, जब आत्मा तृप्त होती है, तो एक अंतिम कर्म बचता है – ‘ब्रह्मकपाली’ में श्राद्ध, जो बदरीकाश्रम क्षेत्र में किया जाता है। इसके बाद उस आत्मा के नाम का श्राद्ध फिर कभी नहीं किया जाता, क्योंकि वह पूर्णत: दिव्य लोक में विलीन हो जाती है।
पापों से मुक्ति की अमर भूमि
पुराण कहते हैं – गया में पिंडदान करने से ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी जैसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं। मानो यह भूमि, मृत्यु के भय को भी मात देने वाली माता हो, जो हर आगंतुक को यह कहती है – “पुत्र, यहाँ तुम्हारे पितर तृप्त होंगे, और तुम स्वयं अमर हो जाओगे।”
गया केवल एक तीर्थ नहीं है, यह वह स्थान है जहाँ श्रद्धा, भक्ति और विरह – तीनों एक साथ मिलकर मोक्ष का मार्ग बनाते हैं। जहाँ एक पुत्र की आँखों का आँसू भी तर्पण बन जाता है, जहाँ एक मुट्ठी तिल भी आत्मा का उद्धार कर देती है।
जय गया विष्णुपाद भगवान की