जीवन में दुख-सुख का सामना कैसे करें?

एक विशाल समुद्र है। कभी उसमें लहरें कोमल होकर तट को सहलाती हैं, तो कभी वही लहरें तूफ़ान बनकर सबकुछ बहा ले जाने का सामर्थ्य रखती हैं। हमारा जीवन भी इसी समुद्र की तरह है, कभी सुख की ठंडी हवा बहती है, तो कभी दुख के तूफ़ान उठ खड़े होते हैं। लेकिन, अगर कोई नाविक समुद्र पर उतरे और यह आशा करे कि लहरें हमेशा शांत रहेंगी… तो क्या यह संभव है? बिल्कुल नहीं। उसी तरह, अगर हम यह मान लें कि जीवन में कभी दुख नहीं आएगा, तो यह भी असंभव है।

जब सुख आता है, तो वह ऐसे लगता है जैसे तपती दोपहर में अचानक ठंडी छाँव मिल गई हो। जैसे किसी रेगिस्तान में चलते हुए दूर कहीं नखलिस्तान दिखाई दे जाए। लेकिन यहाँ एक रहस्य है, अगर उस छाँव को देखकर हम वहीं ठहर जाएँ, तो यात्रा अधूरी रह जाएगी। सुख हमें रुकने के लिए नहीं, बल्कि अगली कठिन राह तय करने के लिए शक्ति देने आया है।

जब दुख आता है, तो वह ऐसा लगता है जैसे काली रात ने चारों ओर अपना घेरा डाल दिया हो। परंतु ध्यान रहे, काली रात कभी स्थायी नहीं होती। रात चाहे जितनी लंबी हो, अंत में सूरज उगता ही है। रामायण में भी देखिए, वनवास के चौदह वर्ष, सीता हरण, रावण का अत्याचार… ये सब राम जी के जीवन की “अंधेरी रातें” थीं। परंतु इन्हीं अंधेरों ने उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया, उनकी महिमा को अमर कर दिया। बात यही है कि, दुख हमें तोड़ने नहीं, गढ़ने आता है।

जैसे लोहे को तपाकर, पीटकर, आग में डालकर ही उसे तलवार बनाया जाता है। उसी तरह जीवन की कठिनाइयाँ हमें हमारी असली ताक़त से मिलवाती हैं। अगर लोहा आग से बचना चाहे, तो वह कभी तलवार नहीं बन सकता। उसी तरह, अगर इंसान दुख से भागेगा, तो वह कभी अपनी वास्तविक क्षमता को पहचान ही नहीं पाएगा।

जीवन एक यात्रा की तरह है। कभी रास्ता समतल और फूलों से भरा होता है, तो कभी उसी राह पर काँटे और पत्थर बिखरे मिलते हैं। यात्री को अगर केवल फूलों की राह ही मिले, तो उसकी यात्रा अधूरी और नीरस हो जाएगी। लेकिन जब वह काँटों पर चलता है, तब उसके पाँव भले ही घायल होते हैं, पर वही घाव उसे सहनशीलता और धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं। इसी से वह मंज़िल तक पहुँचने योग्य बनता है।

और इस यात्रा का सबसे बड़ा सहारा है, प्रभु का स्मरण । चाहे जीवन में सुख का मधुर संगीत बज रहा हो या दुख का करुण राग, मन से भगवान का नाम कभी छूटना नहीं चाहिए। सुख के समय अगर हम उनका स्मरण भूल जाते हैं, तो वह सुख हमें अहंकार की ओर ले जाता है। और दुख के समय अगर हम नाम-स्मरण करते हैं, तो वही नाम हमारे लिए दीपक बनकर दुःख के अंधेरे को चीर देता है। जैसे मछुआरा नदी में नाव चलाते समय चप्पू को कभी छोड़ता नहीं, चाहे नदी तूफान के हिलकोरो में हो या शांति के गुलज़ार में, वैसे ही इंसान को जीवन के उतार-चढ़ाव में प्रभु का नाम थामे रखना चाहिए। तभी वह डूबेगा नहीं, बल्कि पार पहुँच जाएगा।

तो जब सुख मिले, उसका आनंद लीजिए, पर उसमें खो मत जाइए। जब दुख मिले, उससे डरिए मत, उसे गले लगाइए, क्योंकि वही आपको मजबूत बनाकर अगले सुख के लिए तैयार करेगा। याद रखिएगा, “जीवन एक नदी है। पत्थरों से टकराकर ही उसकी कल-कल ध्वनि सुनाई देती है। अगर रास्ते में रुकावटें न हों, तो नदी भी निस्तब्ध हो जाएगी।”

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