विष्णु सहस्त्रनाम एक रहस्यमयी गाथा ?

विष्णु सहस्त्रनाम -जहाँ हर नाम में छिपा है अनन्त ब्रह्म

एक शांत संध्या थी… युद्ध का शोर अब थम चुका था। कुरुक्षेत्र की भूमि अब मौन थी,जहाँ कभी रथों के पहिए पृथ्वी को चीर देते थे, वहीं आज धूल बैठ चुकी थी, जैसे स्वयं समय ने भी अपने चरण रोक लिए हों। वहीं, सूर्य की रक्तिम किरणों के नीचे, शरशय्या पर लेटे थे, महान योद्धा, धर्म के जीवित प्रतीक- भीष्म पितामह। उनके शरीर पर बाणों का शयन था, पर मुखमंडल पर ऐसा तेज़ कि मानो वेदों का सारा ज्ञान उसी एक देह में समा गया हो।


युधिष्ठिर का प्रश्न और युगों तक गूंजने वाला उत्तर

उस दिन धर्मराज युधिष्ठिर थके हुए, उलझे हुए, पर सत्य की खोज में आगे बढ़े। श्रीकृष्ण उनके साथ थे, स्वयं परमेश्वर, जो मानवता के प्रश्नों के उत्तर बनकर चलते हैं। भीष्म के चरणों में झुककर युधिष्ठिर ने पूछा – “पितामह! यह संसार दुखों से भरा है, मनुष्य जन्म-मरण के बंधन में जकड़ा है। बताइए, कौन-सा धर्म ऐसा है जो सबसे श्रेष्ठ है? कौन-सा जप ऐसा है जो मोक्ष के द्वार खोल देता है?” भीष्म मुस्कुराए… उनकी आँखों में जैसे विष्णु का तेज़ उतर आया हो। धीरे से बोले – “वत्स युधिष्ठिर, संसार में परम धर्म है, भगवान नारायण का स्मरण। और वह स्मरण तब पूर्ण होता है जब मनुष्य विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करता है।”


विष्णु सहस्त्रनाम की उत्पत्ति का अमृत प्रसंग

भीष्म बोले- “यह कोई साधारण स्तोत्र नहीं है… यह उन नामों का पुष्पहार है, जो स्वयं सृष्टि के साथ अस्तित्व में आए।” उन्होंने कहा- “यह नाम- पद्म पुराण में शिव ने पार्वती से कहा था, स्कंद पुराण में ब्रह्मा ने देवताओं को सुनाया था, गरुड़ पुराण में श्रीहरि ने स्वयं रुद्र को बताया था, और महाभारत में मैंने युधिष्ठिर को सुनाया है।” प्रत्येक नाम एक दीपक है – जो मन के अंधकार को मिटा देता है। हर नाम एक श्वास की तरह है- जिससे आत्मा का जीवन चलता है।


जब भगवान ने भी किया भक्त का ध्यान

युधिष्ठिर को याद आया एक बार उन्होंने देखा था, भगवान श्रीकृष्ण ध्यान में लीन हैं, शरीर पुलकित है, मुखमंडल पर दिव्य तेज़। जब ध्यान पूरा हुआ, युधिष्ठिर ने पूछा- “प्रभु! सब लोग आपका ध्यान करते हैं, पर आप किसका ध्यान कर रहे थे?” कृष्ण मुस्कुराए- “मैं अपने भक्त भीष्म का ध्यान कर रहा था। वह शरशय्या पर पड़ा मेरा स्मरण कर रहा है, तो मैं क्यों न उसका करूँ?” यह सुन युधिष्ठिर के नेत्र नम हो गए। वह समझ गए- नाम जप की शक्ति वही है, जो भगवान को भक्त के चरणों तक खींच लाए।


नाम जप से मिली अद्भुत सिद्धि

भीष्म ने जब विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया, तो पूरा युद्धभूमि जैसे शांत हो गया। ऋषि-मुनि मौन हो गए, देवता नतमस्तक हुए। भीष्म के चारों ओर अब युद्ध नहीं था, बस नारायण ही नारायण थे। ऊपर नारायण, नीचे नारायण, बाएँ-दाएँ, भीतर-बाहर हर दिशा में बस भगवान का स्वरूप ही था। उनकी आत्मा धीरे-धीरे उसी नारायण में विलीन हो गई। यह था एक ऐसा क्षण, जहाँ भक्त और भगवान एकाकार हो गए।


नाम की महिमा-अनंत और अकल्पनीय

कलयुग में कहा गया है “युगों-युगों में यदि कोई साधन सरल, सहज और दिव्य है, तो वह है नाम-स्मरण।” हर नाम एक शक्ति है, कभी रक्षा करता है, कभी मन को शांति देता है, कभी अशुभ को शुभ में बदल देता है। जो प्रतिदिन सहस्त्रनाम सुनता या जपता है, उसके जीवन से भय, रोग, क्लेश, नकारात्मकता धुएँ की तरह उड़ जाते हैं। मन प्रसन्न रहता है, बुद्धि निर्मल, हृदय आनंदमय। भगवान का नाम वही जानता है जो उसे जपकर देखता है, क्योंकि नाम की महिमा बताई नहीं जाती, महसूस की जाती है।


राम नाम की अद्वितीय शक्ति

शास्त्रों ने कहा है –
“राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥”
अर्थात- “राम नाम का एक उच्चारण विष्णु सहस्त्रनाम के समान फल देता है।” इसलिए जो भी हो दिन में एक बार, मन में शांति के क्षण में, भगवान का नाम अवश्य जपो। क्योंकि जब तुम भगवान को पुकारते हो, तो भगवान भी तुम्हें उसी क्षण पुकारने लगते हैं।


नाम में ही नारायण हैं

विष्णु सहस्त्रनाम कोई ग्रंथ नहीं, यह वह संगीत है, जिससे सृष्टि गूँजती है। यह वह ध्वनि है, जिससे देवता भी मोहित होते हैं। यह वह सेतु है, जो मनुष्य को भगवान तक ले जाता है। जो इसका पाठ करता है, वह केवल शब्द नहीं बोलता- वह हर नाम के साथ अपने भीतर के ब्रह्म को जगाता है। और जब ब्रह्म जागता है… तो मृत्यु, भय, और दुःख- सब पीछे रह जाते हैं।

Similar Posts