यदि केवल नाम जप करने से प्रभु प्राप्त हो जाते हैं तो पूजा की क्रियाएं क्यों करनी होती है ?
भक्ति का मार्ग केवल एक रेखा नहीं, बल्कि अनेक पगडंडियों का संगम है। कोई केवल नाम-जप में डूब जाता है और प्रभु को पा लेता है, तो कोई पूजा-विधि से प्रभु की आराधना करता है। नाम-जप हृदय की सहज पुकार है, जैसे बच्चा दूर से माँ को पुकारे और माँ दौड़ी चली आए। यह हृदय और ईश्वर के बीच सीधी डोर है। किन्तु पूजा वैसी है जैसे वही बच्चा माँ के पास जाकर उनके चरण दबाए, फूल अर्पित करे, मिठाई दे और उनके प्रति कृतज्ञता दिखाए। पुकारने से माँ आती है, पर सेवा करने से माँ ठहरती है और अपना स्नेह बरसाती है।
नाम-जप वैसा है जैसे मित्र को पत्र लिखकर भाव पहुँचाना। शब्दों में प्रेम प्रकट होता है और दूरी के बावजूद आत्मा तृप्त होती है। किन्तु पूजा वैसी है जैसे उसी मित्र से आमने-सामने मिलकर भोजन करना। वहाँ भाव के साथ स्पर्श, निकटता और आत्मीयता भी जुड़ जाती है। नाम-जप आत्मा की पुकार है, पूजा उसका रूप और आचरण।
नाम-जप दीपक की लौ है, जो भीतर का अंधकार तुरंत मिटा देती है। किन्तु पूजा उस दीपक में घी डालने जैसी है, जो लौ को स्थिर और दीर्घ बनाती है। बिना घी के लौ बुझ सकती है, और बिना लौ के घी व्यर्थ है। दोनों मिलकर ही जीवन को प्रकाशमान करते हैं। इसी प्रकार नाम-जप हृदय को शुद्ध करता है, और पूजा उसे स्थायी संस्कार देती है।
नाम-जप फूल की सुगंध है, जो अदृश्य होकर भी मन को तृप्त करती है। पूजा उस फूल की आरती है, जिसमें सुगंध के साथ उसका रंग और रूप भी प्रभु को समर्पित होता है। सुगंध आत्मा को छूती है, रूप इंद्रियों को अनुशासन देता है। दोनों मिलकर ही भक्ति पूर्ण बनती है।
नाम-जप वह सरल पुकार है जो आत्मा को ईश्वर से जोड़ती है, और पूजा वह अनुशासन है जो जीवन को ईश्वरमय बनाती है। नाम-जप से प्रभु मिलते हैं, पर पूजा से प्रभु टिकते हैं। नाम-जप आत्मा का आभूषण है, और पूजा जीवन का संस्कार। जैसे सुगंध और रंग मिलकर फूल को पूर्ण बनाते हैं, वैसे ही नाम-जप और पूजा दोनों मिलकर भक्ति की पूर्णता रचते हैं।