खुद को जानना कैसा होता है ?

जब एक नदी अपनी यात्रा शुरू करती है, तो वह कितनी चंचल और अस्थिर होती है, पर्वतों से उतरते समय उसकी धाराएँ बलखाती हैं, चट्टानों से टकराती हैं, शोर मचाती हैं, लेकिन जैसे-जैसे वह समतल भूमि पर आती है, वैसे-वैसे शांत और गहरी होती जाती है, और अंततः, वह समुद्र में मिलकर अपने वास्तविक अस्तित्व को पहचान लेती है कि वह सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि स्वयं समुद्र का ही विस्तार थी,

यही हमारी स्वयं को जानने की यात्रा है, जब हम “खुद को जानने” की राह पर बढ़ते हैं, तो प्रारंभ में हमारा मन विचारों से भरा होता है, सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान की लहरें हमें इधर-उधर भटकाती हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम ध्यान, भक्ति और आत्म-चिंतन के माध्यम से भीतर उतरते हैं, वैसे-वैसे यह हलचल शांत होने लगती है और हमें अपने असली स्वरूप का बोध होने लगता है,

आप एक अंधेरे कमरे में बैठे हैं, आपको कुछ भी दिखाई नहीं देता, अचानक कोई एक दीपक जलाता है, और पल भर में सबकुछ स्पष्ट दिखने लगता है, कमरे की दीवारें, फर्श, छत, और यहाँ तक कि कोने में पड़ा वह पुराना बक्सा भी, जिसे आप भूल चुके थे,

आत्म-ज्ञान का प्रकाश भी ऐसा ही होता है, जब तक अज्ञानता का अंधकार रहता है, हमें नहीं पता कि हम कौन हैं, हम शरीर, नाम, रिश्तों और भौतिक वस्तुओं में अपनी पहचान खोजते रहते हैं, लेकिन जब आत्मा का दीपक जलता है, तब हमें अहसास होता है कि हम इससे कहीं अधिक हैं, हम नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शाश्वत आत्मा हैं, जो अमर, अजर और अविनाशी है,

यह वैसा ही है जैसे एक छोटा सा बच्चा जो खुद को केवल एक नाम समझता है, “मैं राम हूँ, मैं श्याम हूँ,” लेकिन जब वह बड़ा होता है, उसे पता चलता है कि वह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उसके अंदर अनगिनत क्षमताएँ छिपी हैं, आत्म-ज्ञान भी हमें हमारी अपार संभावनाओं से परिचित कराता है,

एक शांत झील को देखिए, जब उस पर कोई पत्थर फेंका जाता है, तो पानी में लहरें उठती हैं, जो झील के प्रतिबिंब को बिगाड़ देती हैं, लेकिन जब पानी स्थिर होता है, तो उसमें आसमान का सही प्रतिबिंब दिखता है,

हमारा मन भी ऐसा ही है, जब तक उसमें विचारों की हलचल रहती है, इच्छाएँ, आशाएँ, भय, क्रोध, मोह, तब तक हमें अपनी आत्मा का असली स्वरूप नहीं दिखता, लेकिन जब हम ध्यान और साधना से मन को शांत कर लेते हैं, तो उसमें परमात्मा का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखने लगता है,

यह वैसा ही है जैसे जब हवा बहुत तेज चलती है, तो तालाब का पानी हिलता रहता है और कुछ भी साफ नहीं दिखता, लेकिन जैसे ही हवा रुकती है, पानी स्वच्छ दर्पण की तरह सबकुछ साफ दिखाने लगता है,

अगर कोई दर्पण बहुत धूल से भरा हो, तो उसमें हम अपनी शक्ल भी नहीं देख सकते, लेकिन जैसे ही हम उसे कपड़े से साफ करते हैं, हमारा प्रतिबिंब साफ दिखाई देने लगता है,

हमारे मन का दर्पण भी ऐसा ही है, उसमें इच्छाओं, वासनाओं, अहंकार और सांसारिक उलझनों की धूल जम जाती है, जिससे हमें अपनी असली पहचान नहीं दिखती, हम इच्छाओं, वासनाओं को “स्वयं मैं हूँ” समझने लगते हैं, लेकिन जब हम सेवा, सत्संग, ध्यान और भक्ति के माध्यम से इस धूल को हटाते हैं, तब हमें अपनी दिव्यता का अहसास होता है,

एक साधु ने एक बार एक चेला को एक गंदे शीशे के सामने खड़ा किया और पूछा, “क्या तुम इसमें खुद को देख पा रहे हो?” चेला बोला, “नहीं गुरुदेव, यह तो बहुत गंदा है,” साधु ने उसे कपड़ा देकर कहा, “इसे साफ करो,” जब शीशा साफ हुआ, तो चेले को अपना चेहरा दिखने लगा, साधु मुस्कुराए और बोले, “यही तुम्हारी स्थिति है, जब तक मन का दर्पण साफ नहीं होगा, तुम खुद को नहीं जान पाओगे,” तुम्हें लगेगा वह वासनाओं की धूल तुम हो, बल्कि सच तो यह है कि धूल कभी कांच का हिस्सा थी ही नहीं, वह तो विकार मात्र था जो कांच पर जम गया, जिसे हम अज्ञानवश कांच का हिस्सा समझ बैठे, इसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह इस शरीर के हिस्से हैं, मतलब कि धूल, और आत्मा है कांच जो कभी गंदी ही नहीं हुई, वह हमेशा हमारे साथ है, बस धूल जमने के कारण हमें दिखाई नहीं दे रही,

हर बीज में एक विशाल वृक्ष बनने की क्षमता होती है, लेकिन जब तक वह सही मिट्टी, पानी और धूप नहीं पाता, तब तक वह अंकुरित नहीं हो सकता, हमारी आत्मा भी ऐसा ही बीज है, इसमें असीमित ज्ञान, शक्ति और आनंद छिपा हुआ है, लेकिन जब तक यह भक्ति, साधना और आत्म-चिंतन की मिट्टी में नहीं पड़ता, तब तक यह अपनी पूर्णता तक नहीं पहुँचता,

अगर एक बीज सोचने लगे कि “मैं बस एक छोटा सा दाना हूँ, मुझमें कुछ भी खास नहीं,” तो क्या वह कभी बड़ा पेड़ बन पाएगा? नहीं, उसे यह समझना होगा कि वह सिर्फ एक छोटा बीज नहीं, बल्कि एक विशाल वटवृक्ष का प्रारंभ है, ठीक इसी तरह, जब हम अपने भीतर छिपी दिव्यता को पहचानते हैं, तब हमें अहसास होता है कि “हम केवल शरीर नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की अपार शक्ति हैं,”

जब हनुमान जी अपनी शक्ति को भूल गए, उन्हें लगा कि वे साधारण वानर हैं, लेकिन जब जामवंत जी ने उन्हें याद दिलाया कि वे असीम बलशाली हैं, तो उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग कर संजीवनी पर्वत उठा लिया,

हमारी भी यही स्थिति है, हम भूल गए हैं कि हम कौन हैं, हमें लगता है कि हम बस शरीर, नाम, रिश्ते और भौतिक संपत्ति तक सीमित हैं, लेकिन जब कोई गुरु, कोई साधना हमें हमारी शक्ति का अहसास कराती है, तब हम भी असंभव को संभव कर सकते हैं,

यह वैसा ही है जैसे कोई राजा, जिसे जन्म के बाद जंगल में छोड़ दिया गया था, खुद को एक गरीब समझता रहा, लेकिन जब किसी ज्ञानी ने उसे उसकी असली पहचान बताई, तो वह वापस अपने सिंहासन पर आ गया,

जब हमें आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है, तब हमें समझ आता है कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं, शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है,

एक योगी ने शिष्यों से भरी सभा में एक सूखे पत्ते को उठाया और बोले, “देखो, यह पेड़ से अलग हुआ पत्ता है, यह पेड़ का हिस्सा था, पर अब धरती पर गिरकर मिट्टी में मिल जाएगा, क्या पत्ता ही पेड़ था?”

शिष्य बोले, “नहीं, पत्ता तो बस एक हिस्सा था, पेड़ तो फिर भी खड़ा रहेगा,”

योगी मुस्कुराए, “ठीक वैसे ही, यह शरीर भी आत्मा का बस एक वस्त्र है, तुम वस्त्र नहीं, बल्कि वह हो जो इसे धारण करता है,”

योगी शिष्यों को समुद्र किनारे ले गए, वहाँ एक लहर आई और किनारे पर एक बूँद छोड़ गई, योगी ने कहा, “देखो, यह बूँद समुद्र से अलग लग रही है, लेकिन क्या यह सच में अलग है?”

शिष्यों ने कहा, “नहीं, यह बूँद भी समुद्र का ही अंश है, यह दोबारा समुद्र में समा जाएगी,”

योगी बोले, “बस यही सत्य है, आत्मा भी परमात्मा से अलग नहीं है, जब तक शरीर में रहती है, अलग लगती है, परंतु मृत्यु के बाद यह पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में लौट जाती है,”

क्योंकि इस जगत में जो भी हो रहा है, उसमें हमारा जोर नहीं है, हमारे होने से पहले भी संसार था, मेरे जाने के बाद भी संसार रहेगा, जो मेरे होने के पहले यहाँ की देखभाल करता था, वही मेरे जाने के बाद भी सक्रिय रहेगा,

मैं थोड़ी देर के लिए संसार में एक शरीर लेकर आया और लगा कि यह सब मैं कर रहा हूँ या रही हूँ, बस यही माया है,

जब यह सत्य प्रकट होता है, तब मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, दुख-रहित आनंद की अनुभूति होती है, एवं मनुष्य स्वयं को जानकर “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ), अर्थात मैं उसी ब्रह्म से निकला हूँ और उसी में समा जाऊँगा की अवस्था में स्थिर हो जाता है,

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