“जहाँ मिट्टी ने मंत्र जपना सीखा” – नैमिषारण्य का अमर रहस्य ?
“यह वह क्षण था जब आकाश सुनहरा हो गया, पवन थम गई, और पृथ्वी मौन की गोद में समा गई, क्योंकि ब्रह्म स्वयं बोलने वाले थे। धरती पर एक ऐसा स्थान जहाँ साधारण मिट्टी भी दिव्यता की सुगंध से भर उठी हो, वह स्थान है नैमिषारण्य।
यह वही भूमि है जहाँ एक बार नहीं, बल्कि निरंतर बारह वर्षों तक यज्ञ की अग्नि जलती रही, और उस अग्नि के धुएँ में ब्रह्म का स्वर लहराता रहा। यहाँ 88,000 ऋषियों ने एक साथ बैठकर एक ही प्रश्न पूछा था, “जीवन का परम रहस्य क्या है?”
और तब उस प्रश्न का उत्तर देते हुए सूत जी ने अठारहों पुराणों का दिव्य कथन प्रारंभ किया।
कहते हैं जब उस दिन पहला श्लोक उच्चरित हुआ, तब दिशाएँ झूम उठीं। यज्ञशाला की वेदी से अग्नि की लपटें नहीं, प्रकाश की लहरें उठीं, जो धरती से लेकर देवलोक तक फैल गईं।
साधारण भूमि, जो अब तक केवल मिट्टी थी, उसी क्षण दिव्यता से भरकर तीर्थों की माता बन गई।
जिस भूमि ने भगवान के शब्दों को अपने आँचल में समेट लिया, वह भूमि अब सिर्फ “भूमि” नहीं रही, वह स्वयं एक जीवित धाम बन गई।
देवगणों का आगमन हुआ।
कहते हैं, वेदी बनने के पहले ही दिन आकाश में सूक्ष्म स्वर गूंजे, “हम आ रहे हैं।”
और दूसरे दिन जब आवाहन हुआ, तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश से लेकर सप्तऋषि तक उस वेदी पर विराजमान हो गए।
सूत जी जब पुराणों के मंत्रोच्चार करते, तो हवा तक स्थिर हो जाती थी। एक एक मंत्र से नकारात्मकता की परतें गल जातीं।
जिस मिट्टी में पहले शोर था, अब वहाँ केवल शांति का संगीत गूंजता था।
भगवान की कथा केवल शब्द नहीं होती, वह कंपन (vibration) है, जो अस्तित्व को रूपांतरित कर देती है।
जहाँ कथा होती है, वहाँ स्वयं भगवान अपने मंत्र रूप में विराजते हैं।
और जब 18 पुराणों की गाथा एक साथ गूंजी, तो ब्रह्मांड तक में एक स्पंदन हुआ।
कहते हैं, उस क्षण हनुमान जी स्वयं प्रकट हुए,
वे वायु में नहीं, श्रवण में बसे हुए थे।
हर उच्चरित मंत्र के साथ उनकी मुस्कान फैलती,
और जब कथा के अंत में सूत जी ने नमस्कार किया, तब हनुमान जी ने कहा,
“यह भूमि अब मेरी विश्रामस्थली है। यहाँ जो भी कथा करेगा, मैं स्वयं वहाँ रहूँगा।”
उस दिन से लेकर आज तक, जहाँ कहीं भगवान की कथा होती है, वहाँ देवता आते हैं, ऋषिगण आते हैं,
और हनुमान जी, अनंत भाव से उपस्थित होकर कथा की रक्षा करते हैं।
जो भूमि कथा से धुल गई हो, वह भूमि अब सामान्य नहीं रहती।
वह धरा से धाम बन जाती है,
जहाँ की हर कण में मंत्रों की स्मृति जीवित रहती है।
उस भूमि पर जो पूजा करे, उसे सहस्त्रगुणा फल मिलता है।
वहाँ की हवाएँ प्राण को शांति देती हैं, वहाँ के वृक्ष श्रद्धा से झुकते हैं,
वहाँ का जल अमृत बन जाता है।
और देखिए,
जब 18 पुराणों का अनुष्ठान होता है, तब केवल कथन नहीं होता,
देवलोक और पृथ्वी का संगम होता है।
वहाँ सूर्य तेज नहीं देता, स्वयं तेज बन जाता है।
चंद्रमा केवल ठंडक नहीं देता, करुणा का प्रतीक बन जाता है।
नदियाँ, दिशाएँ, पर्वत, सब अपनी शक्ति उस भूमि में समर्पित कर देते हैं।
इसलिए महापुरुषों ने कहा,
“जहाँ एक श्लोक भी भगवान के नाम से बोला जाए, वह भूमि पवित्र होती है।
और जहाँ अठारहों पुराणों का संपूर्ण वचन हुआ हो, वहाँ के कण-कण में दिव्यता का महासागर समाया होता है।”
उस भूमि का दर्शन मात्र ही पुण्यदायी है।
वहाँ मरण भी मोक्षदायी होता है।
वहाँ पक्षी का स्वर भी मंत्र हो जाता है,
और मिट्टी का कण, परम शांति का बीज।
इसलिए,
जहाँ पुराणों की गाथा हुई हो, वह भूमि नहीं,
वह ईश्वर की साँसों का स्पर्श है,
जहाँ प्रत्येक धूल का कण कहता है,
“यहाँ भगवान बोले थे…”