“जब वृंदावन ने तीन बार ईश्वर को जन्म लेते देखा” ?

वृंदावन की पृष्ठभूमि

वृंदावन की वह सुबह, जहाँ कुहासे के पार से झाँकती सूरज की पहली किरणें यमुना के जल पर सुनहरी लकीर खींच रही हों, मृदंग की थाप दूर से आ रही हो, कहीं मोर अपने पंख फैला रहा हो, और ताजी तुलसी की सुगंध हवा में घुल रही हो। वहीं, इस धरा पर तीन प्रेम कथाएँ अंकित हुईं, तीन दिव्य साक्षात्कार, राधा रमण, राधा वल्लभ और बांके बिहारी जी की प्रकट होने की कथा। ये केवल मूर्तियाँ नहीं, बल्कि प्रेम के मूर्त रूप हैं।

राधा रमण जी की प्रकट होने की कथा

वृंदावन के गोपीनाथ बाजार में एक साधक बैठें हैं, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी। सिर झुका है, नेत्र बंद हैं, हृदय में केवल एक ही भावना, “हे प्रभु, मुझे अपने बालरूप का दर्शन दीजिए।” वह श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रिय शिष्य थे। महाप्रभु ने उन्हें आदेश दिया था, “जाओ, दक्षिण की ओर जाओ, वहाँ तुम्हें तुम्हारे ईष्ट का संकेत मिलेगा।” वे गए, और लौटे, बारह शालिग्राम शिलाओं के साथ। इन शिलाओं में उन्होंने भगवान का साक्षात् निवास देखा। दिन रात सेवा, स्नान, भोग, आरती, उनका जीवन ही भक्ति बन गया था। परंतु हृदय में एक अधूरी तड़प थी, “कब देख पाऊँ उस नटखट श्यामसुंदर को, जिनकी मुस्कान में सृष्टि निहित है?”

वह दिन आया। नारायण यज्ञ सम्पन्न हुआ। यमुना किनारे रात बीती, शालिग्राम शिलाएँ दीपों की लौ में नहाई हुईं। सुबह जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो हृदय थम गया। एक शिला अब शिला नहीं रही, वह स्वयं राधा रमण बन चुकी थी। छोटा, मोहक, जीवंत। ऐसा लगता था मानो अभी-अभी माँ यशोदा ने उन्हें तेल लगाकर खड़ा किया हो, आँखों में वही चपलता, होठों पर वही बाल मुस्कान। वह दिन था जब वृंदावन ने देखा, भक्ति ने भगवान को जन्म दिया। राधा रमण जी आज भी उसी स्वरूप में विराजमान हैं, बिना राधा रानी के भी, उनमें राधा की ही छाया है। कहते हैं, “जो सच्चे हृदय से राधा रमण को देख ले, उसका अंतर्मन स्वयं यमुना सा निर्मल हो जाता है।”

राधा वल्लभ जी की प्रकट होने की कथा

ब्रज की वही भूमि, किनारे बहती यमुना, और एक बालक, हित हरिवंश जी, जिनकी आँखों में संसार नहीं, केवल राधा का स्वरूप है। वह मिट्टी में लोटते, वृंदावन के कुंजों में गाते, “राधा नाम अनमोल है, हर श्वास का सार है।” उनकी भक्ति में मधुरता ऐसी थी कि जैसे प्रेम ने स्वर पा लिया हो। एक दिन, उनकी साधना का उत्कर्ष हुआ। राधा-कृष्ण स्वयं उनके सम्मुख प्रकट हुए। दिव्य प्रकाश, पुष्पों की वर्षा, और यमुना की लहरें तक झूम उठीं।

हरिवंश जी की आँखें नम, “हे प्रभु, यदि यह दर्शन केवल मुझ तक सीमित रहा तो यह स्वार्थ होगा। कृपा कीजिए, इस प्रेम को विग्रह का रूप दीजिए ताकि संसार भी आपको देख सके।” और तभी, उनके समक्ष राधा वल्लभ जी का विग्रह प्रकट हुआ। इस मूर्ति में केवल कृष्ण हैं, परंतु ब्रज का हर भक्त जानता है, उनकी बाँह के दाएँ ओर राधा रानी अदृश्य रूप में खड़ी हैं। यह वह प्रेम है जो देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है। मंदिर में जब आरती होती है, तब एक अजीब अनुभूति होती है, जैसे राधा रानी मंद मुस्करा रही हों और श्रीकृष्ण उनकी ओर निहार रहे हों। यह विग्रह संसार को सिखाता है, प्रेम रूप नहीं मांगता, वह बस समर्पण मांगता है।

बांके बिहारी जी की प्रकट होने की कथा

वृंदावन का निधिवन, रात गहरी है, परंतु हर पत्ता झूम रहा है। एक संत बैठे हैं, स्वामी हरिदास जी। उनकी वीणा की धुन में स्वयं बृज धाम थिरक रहा है। उनके शिष्य, तानसेन, मौन हैं, क्योंकि आज सुरों का जन्मदाता स्वयं अपने ईश्वर को राग सुना रहा है। हरिदास जी की आँखें बंद हैं, पर हृदय में दृश्य स्पष्ट है, राधा-कृष्ण निधिवन में रास रचाते हैं। उनके गीत का हर स्वर भक्ति का दीपक है।

और तभी, वृक्ष झूमने लगे, वायु ठहर गई, आकाश से पुष्प बरसे, राधा-कृष्ण उनके सम्मुख प्रकट हुए। हरिदास जी नतमस्तक हुए, “प्रभु, मेरे समान भाग्य किसका? परंतु आपकी यह लीला केवल मैं ही क्यों देखूँ? आप सदा यहाँ रहें, ताकि हर भक्त आपकी झलक पा सके।” और तभी, राधा-कृष्ण का सम्मिलित स्वरूप, बांके बिहारी जी, वहाँ प्रकट हुए। कमर, गर्दन और मुख, तीनों दिशाओं में झुके हुए, यही तो “बांके” हैं। और “बिहारी”? वह जो ब्रज में आनंद के साथ बिहार करते हैं।

आज भी मंदिर में जब पट खुलते हैं, भक्तों के नेत्र उनसे मिल नहीं पाते। क्योंकि कहते हैं, जो बिहारी जी की आँखों में देख ले, वह संसार से दृष्टि हटा नहीं सकता। इसी कारण वहाँ “झलक मात्र दर्शन” की परंपरा है। वह दर्शन, वह क्षण, वही रास, आज भी निधिवन में जीवित है, रात को द्वार बंद होते ही मानो फिर से वही रास प्रारंभ हो जाती है, और बिहारी जी मुस्करा उठते हैं।

तीनों ठाकुरों की महिमा

तीनों ठाकुर, तीनों स्वरूप, प्रेम के तीन रूप हैं।

राधा रमण, भक्ति की साधना।
राधा वल्लभ, प्रेम की आत्मा।
बांके बिहारी, आनंद का साक्षात रूप।

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