तुलसी की माला कब या किस उम्र में पहनी जा सकती है?

जिस प्रकार एक नवजात शिशु के जन्म के साथ ही उसकी साँसें ईश्वर के आदेश पर चलने लगती हैं, और माँ का दूध उसके जीवन का पहला आहार बन जाता है, क्या कोई पूछता है कि उस पहले श्वास का कोई शुभ मुहूर्त था? या उस प्रथम आहार के लिए कोई उम्र निर्धारित थी?
नहीं… क्योंकि जीवन के लिए जो आवश्यक है, वह समय की प्रतीक्षा नहीं करता।

ठीक उसी प्रकार तुलसी, जो स्वयं भगवान की वल्लभा हैं, भगवान की प्रियतम है, उनका स्मरण, उनका स्पर्श, उनका धारण किसी उम्र, किसी मुहूर्त या किसी योग्यता की सीमा में नहीं बँधता।
वह तो जन्म से ही कल्याणमयी हैं।
जिस प्रकार माता अपने बालक के गले में रक्षा-सूत्र बाँधती है, वैसे ही यदि बचपन में तुलसी की माला धारण करा दी जाए, तो समझिए, ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा का वचन दे देते हैं।

एवम् इसे कौन पहन सकता है और इसके लाभ क्या हैं?

अब यह प्रश्न उस वटवृक्ष की छाँव जैसा है, जहाँ हर पथिक को स्थान मिलता है, चाहे वह किसी भी दिशा से क्यों न आया हो।

संत कबीरदास जी की कथा यहाँ जैसे उजाला बनकर सामने आती है।
कबीर, एक मुस्लिम घर में जन्मे, पर आत्मा जैसे किसी और युग से आई थी। उनके भीतर राम का नाद गूँजता था।
एक दिन किसी संत ने पूछा,
“बाबा! आप तो गले में दर्जनों तुलसी की मालाएँ पहने रहते हैं, क्या इतना भार नहीं लगता?”

कबीर मुस्कराए, वह मुस्कान जिसमें करुणा और गहराई दोनों झलकती थी।
उन्होंने कहा,
“आपका जन्म उस भूमि पर हुआ है जहाँ राम नाम हवा में बसा है, जहाँ संस्कृति की मिट्टी से ही भक्ति की सुगंध आती है।
पर मैं… मेरा जन्म वहाँ हुआ जहाँ उस सुगंध का नाम भी नहीं।
मेरा शरीर अशुद्ध परंपराओं में पला, मन ने कभी नाम का रस नहीं चखा।
तो बताओ, मेरे जैसे पतित को शुद्धि कौन देगा?
तभी सुना कि तुलसी का एक पत्ता, तुलसी की एक माला, तुलसी का एक नाम, पापी को भी पवित्र बना सकता है।
जो तुलसी धारण करता है, वह यमराज की निगाह से भी बच जाता है।
तो मैंने कहा, यदि एक माला इतना दे सकती है, तो मैं दर्जनों पहन लूँ! ताकि मेरे जैसे पतित का भी उद्धार हो जाए।”

यह कहकर कबीर ने अपनी तुलसी की मालाओं को ऐसे छुआ मानो हर मणि में भगवान का हृदय धड़क रहा हो।

तो जब कबीरदास जैसे संत, जो अपने समय में सभी सीमाओं से परे थे, तुलसी को धारण कर सकते हैं,
तो कौन है जो तुलसी की माला के योग्य नहीं?
वह तो सबके लिए है, जाति, धर्म, कुल, परंपरा सबसे ऊपर।
क्योंकि तुलसी कोई आभूषण नहीं, यह आश्रय है।
यह माला नहीं, भगवान के प्रेम का बंधन है, जो गले में पड़ते ही आत्मा से जुड़ जाती है।

लेकिन… तुलसी की माला केवल पहनने की वस्तु नहीं, वह एक संकल्प है।
जिस दिन यह माला गले में पड़ी, उस दिन से जीवन का हर कार्य, हर विचार, हर संगति भगवान के अनुरूप होना चाहिए।
क्योंकि तुलसी जहाँ बसती है, वहाँ पाप और असत्य टिक नहीं सकते।

यदि तुलसी धारण करके भी मन गलत कर्मों, असत्य मार्ग, और दूषित विचारों में उलझा रहे, तो वह ऐसा ही है जैसे कोई पवित्र जल में डूबकर भी भीतर की मैल न धोए।

इसलिए तुलसी की माला केवल एक धागा नहीं,
यह उस क्षण की गवाही है जब आत्मा कहती है,
“हे प्रभु! अब मैं आपका हूँ।”

और उस क्षण से, चाहे मनुष्य कितना भी पतित क्यों न रहा हो,
भगवान की कृपा उसकी रक्षा बन जाती है,
और तुलसी माँ की सुगंध उसके चारों ओर एक अदृश्य कवच की तरह फैल जाती है।

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