“जब प्रकाश स्वयं चल पड़ा अंधकार की खोज में – तब जन्म हुआ सद्गुरु का” ?

“मनुष्य का जन्म एक अधूरी पुस्तक की तरह होता है…
और गुरु वह लेखक होता है जो उसके पन्नों को अर्थ देता है।”

सच ही तो है – जीवन एक विशाल महासागर है।
कभी शांत, कभी उफनता हुआ, और कभी दिशा हीन…
पर जब तक कोई “नाविक” न मिले,
यह सागर केवल भटकते लहरों का समंदर बनकर रह जाता है।
वह नाविक – गुरु है।
जो अपने अनुभवों की पतवार से हमें पार लगाता है।


जीवन का आरंभ — माँ से मिलता प्रथम पाठ
माँ… वह पहली गुरु जो बिना शब्दों के सिखाती है –
प्यार क्या होता है, सहनशीलता क्या होती है, और मौन में भी संवाद कैसे होता है।
जब बालक माँ की गोद में होता है,
वह केवल दूध नहीं पीता – वह ‘संस्कार’ पीता है।

पिता… दूसरा गुरु, जो दुनिया की राहों पर चलना सिखाता है।
वह कहते नहीं, पर हर गिरती हुई घुटने के साथ हमें उठना सिखाते हैं।

फिर आते हैं शिक्षा गुरु –
जो हमें अक्षरों से जोड़ते हैं,
पर धीरे-धीरे अक्षरों के पार ‘जीवन के अर्थ’ दिखाते हैं।


गुरु केवल सिखाता नहीं – वह आकार देता है।


हर व्यक्ति के भीतर एक बीज होता है।
पर बीज कब वृक्ष बनेगा, यह उसके ‘माली’ पर निर्भर करता है।
गुरु वही माली है,
जो समय-समय पर काट-छाँट कर,
सूखी शाखाओं को हटाकर,
हमारे भीतर का हरित जीवन जगाता है।

और जब जीवन की राहों पर अंधकार उतरता है –
जब भ्रम, मोह, और निराशा की धुंध सब ओर छा जाती है –
तब एक सद्गुरु प्रकट होता है।
वह दीपक की लौ बनकर केवल राह नहीं दिखाता,
बल्कि यह भी सिखाता है कि दीपक अपने भीतर ही जलता है।


गुरु और सद्गुरु का सूक्ष्म भेद

कहा गया –
“गुरु और सद्गुरु में कोई अंतर नहीं।”
जैसे जल और नीर – दोनों एक ही लगते हैं।

पर देखो ज़रा ध्यान से –
पानी हर जगह मिल जाता है –
कपड़े धोने में, बर्तन माँजने में, नालों में बहने में…
पर जब वही पानी गंगाजल बन जाता है,
तो वह पूजा में चढ़ता है, अमृत कहलाता है।

ठीक वैसे ही,
गुरु वह है जो जीवन को जीने का तरीका सिखाता है –
लोगों से कैसे मिलना, कैसे बोलना, कैसे बनना।

और सद्गुरु वह है जो जीवन को समझने का रहस्य बताता है –
स्वयं से कैसे मिलना,
अपने भीतर के ईश्वर से संवाद कैसे करना।

गुरु कहता है – “दुनिया को जीत लो।”
सद्गुरु कहता है – “पहले स्वयं को जीत लो।”

गुरु शरीर के भीतर की रचना समझाता है,
पर सद्गुरु शरीर के भीतर जो अजर-अमर आत्मा बैठी है,
उसका परिचय कराता है।

गुरु सिखाता है ‘जीना’।
सद्गुरु सिखाता है ‘जागना’।


सद्गुरु की भूमिका – एक नई दृष्टि

जब संसार की धूल आंखों पर छा जाती है,
और हम लोगों की दी हुई दृष्टि से ही दुनिया को देखते हैं,
तब सद्गुरु आते हैं…
और अपने कृपा-प्रसाद का चश्मा पहनाकर कहते हैं –
“अब देखो, यह संसार कितना सुन्दर है।”

उनकी दृष्टि केवल बाहरी नहीं –
वह भीतर उतरती है, आत्मा को छूती है,
और जो कभी बिखरा हुआ था,
वह अपने स्वरूप में लौट आता है।


हर सीख में गुरु का अंश

कभी कोई शब्द सिखा दे,
कभी कोई मौन कुछ कह जाए –
हर सीख, हर ठोकर, हर अनुभव में एक गुरु का अंश छिपा है।

माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, या वह संत जो मार्ग दिखाए –
सभी हमारे गुरु हैं।
क्योंकि हर कोई हमें स्वयं तक पहुँचने की राह बताता है।


और सद्गुरु…
वह केवल राह नहीं दिखाता,
वह हमें ‘राह’ ही बना देता है।

उसकी कृपा से जो भी मिलता है –
वह केवल ज्ञान नहीं, जीवन का सार होता है।

क्योंकि इस सृष्टि में अब तक ऐसा कोई सफल व्यक्ति नहीं मिला,
जिसे किसी गुरु या सद्गुरु का स्पर्श न मिला हो।

जिसे मिला – वह चल पड़ा।
जिसे नहीं मिला – वह आज भी खोज में है।

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