“जब स्वयं भगवान जागते हैं“ – सृष्टि का रहस्यमय प्रभात ?

देवउठनी ग्यारस, जब स्वयं भगवान जागते हैं

रात के अंतिम पहर में, जब आकाश पर चाँद अपनी चांदनी धीरे-धीरे समेटने लगता है, जब धरती की साँसें शीतलता से भर उठती हैं, तभी एक दिव्य कंपन समस्त ब्रह्मांड में दौड़ता है।
चारों दिशाओं में एक मधुर स्पंदन गूंजता है, “जागिए प्रभु, जागिए नारायण!”
और तभी, जैसे कोई सूर्य क्षितिज से झाँकता हो, वैसे ही भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जाग उठते हैं।

यह वही क्षण है, देवउठनी ग्यारस का।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी।
वह दिन जब स्वयं सृष्टि का पालनकर्ता पुनः अपनी लीला के संचालन हेतु जागता है।


चार माह की निद्रा, सृष्टि का मौन विराम

आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, तब समूचा ब्रह्मांड जैसे मौन साधना में लीन हो जाता है।
चार महीने तक धरती पर मांगलिक कार्य रुक जाते हैं, विवाह, यज्ञोपवीत, गृहप्रवेश सब शांत।
यह वह समय होता है जब सृष्टि अपने अंतर में झाँकती है, जैसे नदी अपने तटों को टटोलती है जब उसका प्रवाह थम जाता है।

और फिर…
कार्तिक शुक्ल एकादशी की सुबह, वह दिन आता है जब आकाश का हर तारा मानो दीप बन जाता है,
हर श्वास में हरि-नाम की गूँज उठती है,
“उठो प्रभु, अब इस जगत को फिर से जीवन दो।”


जागरण, जब अंधकार में दीप जले

देवउठनी ग्यारस की सुबह सिर्फ सूर्योदय नहीं होती, यह दिव्यता का उदय है।
यह वह क्षण है जब ब्रह्मांड फिर से स्पंदित होता है, जब हर सूखी डाली पर जीवन की कोंपल फूट पड़ती है।
भगवान विष्णु का जागना केवल देवताओं का उत्सव नहीं, यह मनुष्य के भीतर की सुप्त चेतना का जागरण है।

यह मानो किसी बंद द्वार का खुलना है,
जहाँ वर्षों से भीतर कैद प्रकाश अचानक बाहर निकल आता है और जीवन को आलोकित कर देता है।
सृष्टि में गति लौटती है, और शुभ कार्यों की श्रृंखला पुनः प्रारंभ होती है।
विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, संस्कार, सब उस नए प्रभात के साथ खिल उठते हैं,
जैसे सर्दी की ठिठुरन के बाद पहली धूप शरीर को स्पर्श करती है।


तुलसी विवाह, जब भक्ति और प्रेम मिलते हैं

इस दिन का सबसे पवित्र और रमणीय क्षण होता है तुलसी विवाह
जब धरती की पुत्री तुलसी माता, स्वयं भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से परिणय सूत्र में बंधती हैं।

वह दृश्य कितना अलौकिक होता है,
तुलसी के पत्तों पर ओस की बूंदें जैसे चाँदी की माला बन जाती हैं,
घरों में दीप जलते हैं, और वातावरण में संगीतमय मंत्रों की गूँज होती है।
वह विवाह किसी साधारण मिलन का नहीं, यह आत्मा का परमात्मा से मिलने का प्रतीक है।

जैसे कोई नदी अपने प्रवाह में सागर से मिलने निकलती है,
वैसे ही तुलसी का हृदय विष्णु के प्रेम में लीन हो जाता है।
यह विवाह हमें सिखाता है, भक्ति बिना प्रेम अधूरा है, और प्रेम बिना समर्पण बंधन है।


उपवास, आत्मा का स्नान

इस दिन का उपवास केवल अन्न त्याग नहीं, यह आत्मा का स्नान है।
जब मनुष्य अपने भीतर उतरता है, तब वह पाता है कि कितनी धूल जमा है मन के कोनों में।
देवउठनी ग्यारस का उपवास उन कोनों को प्रकाश से भर देता है।

जैसे बरसात की पहली बूंद सूखी मिट्टी में जीवन जगाती है,
वैसे ही यह दिन हमारे अंतर्मन में भक्ति की गंध भर देता है।
यह तप, यह ध्यान, यह व्रत, वह दीपक है जो अंधेरे को चीरकर भीतर की ज्योति प्रकट करता है।


देवउठनी ग्यारस केवल एक तिथि नहीं, यह स्मरण है उस क्षण का जब ईश्वर स्वयं हमें कहता है,
“अब जागो, मेरे अंश! तुम भी निद्रा से उठो। अपने भीतर के देवत्व को जगाओ।”

यह पर्व हमें यह सिखाता है कि हर मनुष्य के भीतर एक सोया हुआ विष्णु है,
जो भक्ति, प्रेम और आत्मज्ञान के स्पर्श से जाग सकता है।

जब वह जागता है, तब जीवन स्वयं दीपावली बन जाता है,
हर श्वास में प्रकाश, हर कर्म में भक्ति, और हर हृदय में नारायण

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