“जब अर्जुन थम गया… और कृष्ण मुस्कराए – कर्म और भक्ति का संवाद” ?
कुरुक्षेत्र का क्षण, कर्म का आरंभ
रथ के पहिए धूल में धँसे हैं, ध्वज पर हनुमान जी का पताका लहरा रहा है, अर्जुन के हाथ काँप रहे हैं, वह धनुष नीचे रख देता है, और तभी मृदुल मुस्कान लिए श्रीकृष्ण कहते हैं, “अर्जुन! यह क्षण केवल तेरा नहीं, सम्पूर्ण जगत का है, कर्म को समझ, क्योंकि यही तेरी गति भी है और मुक्ति भी।”
कर्म का रहस्य, सृष्टि को बाँधने वाला तंतु
कर्म क्या है, यह वह अदृश्य तंतु है जो समस्त सृष्टि को बाँधे हुए है, हर कण, हर प्राणी, हर पत्ता अपनी गति में है, यह भी एक कर्म है। मनुष्य का कर्म भी उसी जाल का एक सूत्र है, परंतु यह सूत्र हर किसी के लिए अलग रंग का है। माता-पिता के लिए सेवा का रंग है, भाई के लिए स्नेह का, गुरु के लिए श्रद्धा का, और ईश्वर के लिए समर्पण का।
अर्जुन और भीष्म, कर्म की गति का साक्षात उदाहरण
एक ही मनुष्य कितने रूपों में बँटा है, कभी पुत्र बनकर सिर झुकाता है, कभी योद्धा बनकर तीर चलाता है, कभी शिष्य बनकर चरणों में गिरता है। भीष्म पितामह के सामने खड़ा अर्जुन इसका साक्षात उदाहरण है, जिसने जिन चरणों को प्रणाम किया था, उसी के विरुद्ध आज धर्म के लिए शस्त्र उठा लिया, और जब युद्ध की अग्नि शांत हुई, वही अर्जुन फिर उन्हीं चरणों में गिर पड़ा। यही है कर्म की गति, जहाँ परिस्थिति बदलती है, वहीं कर्तव्य भी बदल जाता है।
कर्म का सार, कर्तव्य की पहचान
कर्म का अर्थ केवल कर्म करना नहीं, बल्कि कर्तव्य को पहचानना है। मनुष्य का पहला कर्तव्य स्वयं के प्रति है, कि वह आलस्य, भय और मोह से ऊपर उठे, तेजस्वी बने, बुद्धिमान बने, और अपने धर्म-पथ से कभी विमुख न हो। दान देना, माता-पिता की सेवा करना, गुरु की आज्ञा मानना, और भगवान में दृढ़ आस्था रखना, यही है कर्म का सच्चा रूप।
भक्ति, हृदय की वर्षा
भक्ति क्या है, यह वह वर्षा है जो केवल हृदय के खेत में होती है। जब मन की मिट्टी सूख जाती है, जब अहंकार की धूल जम जाती है, तब एक ही वर्षा उसे जीवंत कर सकती है, वह है भगवान की भक्ति। महापुरुषों ने भक्ति के असंख्य प्रकार बताए, नवधा भक्ति, रागात्मिका, रागानुगा, गौरी भक्ति, पर तुलसीदास जी ने सबका सार दो पंक्तियों में समेट दिया,
“बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास,
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥”
रामनाम, भक्ति का सार तत्व
भक्ति वर्षा ऋतु है, सेवक धान हैं, और रामनाम सावन-भादौं के महीनों के समान हैं। सावन और भादौं, नाम भले दो हों, पर ऋतु एक ही, वर्षा। इसी प्रकार राम का नाम और राम की भक्ति, दो रूपों में दिखती हैं, पर सार एक ही है। जो राम नाम जपता है, वह राम की भक्ति में ही लीन है।
सच्ची भक्ति, विस्मरणहीन स्मरण
भक्ति का अर्थ केवल भजन करना नहीं, बल्कि भगवान का एक क्षण भी विस्मरण न होना है। भोजन में उनका स्मरण, कर्म में उनका अनुशासन, और निद्रा में भी उनकी शरण, यही है सच्ची भक्ति। भक्ति वही है जो सेवा बन जाए, भगवान को उठाना, उन्हें सजाना, आरती उतारना, विश्राम देना, ये सब भक्ति के रूप हैं। यहाँ तक कि गुरु और संतों की सेवा भी भक्ति ही है, क्योंकि वे स्वयं प्रभु का ही अंश हैं।
कपट और भक्ति, अमृत और विष का अंतर
परंतु यह अमृत हर किसी को नहीं मिलता, जो कपट से सेवा करता है, उसके हाथों में यह अमृत विष बन जाता है। कपट में भक्ति नहीं, केवल अभिनय है, और अभिनय से न तो ईश्वर प्रसन्न होते हैं, न ही आत्मा को शांति मिलती है।
कर्म और भक्ति का संगम, जीवन का यज्ञ
कर्म वह है जो हमें संसार में रखता है, भक्ति वह है जो हमें परमात्मा से जोड़ती है। एक बिना दूसरे अधूरा है, कर्म बिना भक्ति सूखा है, भक्ति बिना कर्म निष्फल है। जब दोनों का संगम होता है, तभी जीवन गीता बनता है, तभी हर क्षण रामायण हो उठता है, और तब मनुष्य स्वयं यज्ञ बन जाता है।