“वह दिन, जब पुण्य अमर हुआ”?

“कभी किसी दिन ने ईश्वर से कहा हो, ‘मुझे ऐसा बना दो कि मेरा शुभ कभी समाप्त न हो,’ और ईश्वर ने आशीर्वाद देकर कहा हो, ‘जा, तेरा नाम रहेगा, अक्षय तृतीया।’” ऐसा ही एक दिन है, अक्षय तृतीया। वह तिथि जो कभी बूढ़ी नहीं होती, जिसका हर क्षण सोने से नहीं, पुण्य से भी ज़्यादा शुद्ध होता है।

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया

सूर्य अपनी तपिश में स्वर्ण घोल रहा होता है, गंगा धरती पर उतरने को आतुर होती है, और देवताओं का आकाश भी झुककर इस पृथ्वी को प्रणाम करता है। कहते हैं, इस दिन किया गया जप, तप, यज्ञ, दान या पुण्य न कभी घटता है, न कभी मिटता है, इसलिए यह है “अक्षय”, अर्थात् जिसका कभी क्षय न हो।

क्यों मनाई जाती है?

क्योंकि यह वह दिन है जब युगों ने आँखें खोलीं, सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ इसी दिन हुआ। भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रूप में धरती पर अवतार लिया। इसी दिन भगवान परशुराम ने जन्म लेकर अधर्म को चुनौती दी। भगवान गणेश ने महाभारत की अमर लेखनी प्रारंभ की। और उसी क्षण बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, मानो भगवान स्वयं कह रहे हों, “आज मेरे द्वार पर जो भी आएगा, उसे मैं अक्षय आशीष दूँगा।” वृन्दावन में उसी दिन बांके बिहारी जी अपने चरणों का दर्शन कराते हैं, और गंगा, श्रीहरि के चरणों से बहती हुई, धरती को जीवन से भर देती है। माँ अन्नपूर्णा उसी दिन अवतरित होती हैं, ताकि कभी किसी के घर से अन्न समाप्त न हो। और वही दिन था जब युधिष्ठिर को मिला था वह अक्षय पात्र, जो कभी खाली नहीं होता था। वह केवल पात्र नहीं, भूख के विरुद्ध ईश्वर का वचन था।

नर नारायण का प्रकटोत्सव।

अक्षय तृतीया की बेला जैसे स्वयं स्वर्ग को पुकार रही थी, “आओ देखो, आज ईश्वर स्वयं पृथ्वी पर उतरने वाले हैं।” ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म और रुचि की गोद में जब दिव्य तेज ने आकार लिया, तो सृष्टि के कोने-कोने में आभा फैल गई। वह दिव्यता थी, श्री नर और नारायण की। दो ऐसे तपस्वी जिन्होंने बचपन में ही संसार की मोहिनी को त्याग दिया, और बदरीवन चले गए, जहाँ आज बद्रीकाश्रम है। वहाँ उन्होंने अपने शरीर को तप की अग्नि में जला दिया, और आत्मा को ईश्वर में विलीन कर दिया। देवराज इंद्र घबरा उठे, “कहीं ये मेरे सिंहासन को न छीन लें!” उन्होंने भेजे कामदेव, वसंत और अप्सराएँ, पर वह तपस्वी द्वय तो तप में ऐसे लीन थे, जैसे अग्नि में अग्नि को खोजो, कुछ भिन्न न मिले। कामदेव की सारी शक्तियाँ विफल हुईं। लज्जा से काँपते हुए जब वे क्षमा माँगने लगे, तो नर नारायण ने मुस्कराकर कहा, “मत डरो, हम तुम्हें शाप नहीं, अभय देते हैं।” फिर उन्होंने अपनी योगमाया से एक दिव्य लीला की, उनकी इच्छा से सौंदर्य स्वयं मूर्तिमान हुआ, और वहाँ प्रकट हुईं दिव्य नारियाँ, जिनमें सर्वश्रेष्ठ थी, उर्वशी। कामदेव ने प्रणाम किया और उर्वशी को लेकर स्वर्ग लौट गया। वहाँ उसने कहा, “देवो, मैंने स्वयं परम तप की मूर्ति देखी है। नर और नारायण वे नाम हैं, जिन्हें देख स्वयं इंद्र भी नतमस्तक हो जाए।”

केदारखण्ड की कथा ।

कहा जाता है, उन्हीं नर और नारायण ने हिमालय की निस्तब्धता में पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान शंकर की कठोर आराधना की। तप से प्रसन्न होकर भोलेनाथ प्रकट हुए, “वर मांगो, वत्स!” दोनों भाइयों ने सिर झुकाया, “हे प्रभु, आप इसी लिंग में स्वयं निवास करें, ताकि जो भी यहाँ आए, उसके सारे पाप क्षीण हो जाएँ।” शिव मुस्कराए, “तथास्तु।” और वहीं प्रकट हुआ केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग। आज भी हिमालय की बर्फीली गोद में, जहाँ मानव की सांसें भी कठिनाई से चलती हैं, वहाँ भगवान शंकर स्वयं स्थिर हैं, नर-नारायण की तपस्या के प्रतिफल रूप। पांडवों ने इस स्थल का निर्माण किया, आदि शंकराचार्य ने उसे पुनः जीवित किया, और आज भी केदारनाथ वहीँ खड़ा है, मानो कह रहा हो, “जब तक नर और नारायण का नाम है, तब तक यह धरा अक्षय है।”

इसलिए,

अक्षय तृतीया केवल एक तिथि नहीं, यह वह दिन है जब ईश्वर ने स्वयं को दान में दिया, जब तप ने स्वर्ग को झुका दिया, और जब मनुष्य को यह वरदान मिला कि पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। तो जब भी यह तिथि आए, एक दीप जला दीजिए, एक दान कर दीजिए, एक प्रार्थना कर दीजिए, क्योंकि वह कभी व्यर्थ नहीं जाएगी। वह आपके जीवन के आकाश में अक्षय प्रकाश बनकर चमकती रहेगी।

हरि ॐ तत्सत,

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