“जहाँ अमृत ने धरती को छुआ था – वहीँ जन्मा कुंभ” ?

क्षितिज पर उगता सूरज, गंगा की लहरों पर झिलमिलाती सुनहरी आभा, लाखों श्रद्धालुओं का सागर, जिनकी आँखों में भक्ति की ज्वाला जल रही है, और उस दृश्य के ऊपर एक गूंजती हुई वाणी,

“यह केवल एक मेला नहीं, यह आत्मा और अमृत का संगम है, यह वह क्षण है जब मनुष्य पृथ्वी पर होते हुए भी स्वर्ग का स्पर्श करता है।”

कुंभ मेला, सनातन धर्म का वह महाकाव्य है, जो हर बार पुनः लिखा जाता है, हर बार गंगा, यमुना और सरस्वती की लहरों पर जीवंत होता है। यह कोई उत्सव नहीं, यह आस्था का कालजयी अभिनय है, जहां ऋषि, मुनि, साधु और गृहस्थ, सभी एक मंच पर एकत्र होते हैं, जैसे युगों से बिखरे हुए ब्रह्मांड के तार फिर से एक राग में जुड़ जाते हों।


समुद्र मंथन से कुंभ तक

समय के आरंभ में जब देवता और दानव एक साथ समुद्र का मंथन कर रहे थे, तब सृष्टि का सबसे दुर्लभ रत्न निकला, अमृत कलश। उस कलश से छलकती अमृत बूँदें जैसे ही पृथ्वी पर गिरीं, चार स्थानों ने उस अमृत को अपने हृदय में समेट लिया, हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक।

वहीं से प्रारंभ हुआ कुंभ का अध्याय। यह वही क्षण था जब पृथ्वी पर देवत्व ने अपना घर बनाया। कुंभ मेला इस स्मृति का पुनरावर्तन है, जैसे हर युग में देवता हमें याद दिलाते हों कि “अमृत अब भी तुम्हारे भीतर है, बस एक डुबकी दूर।”


कुंभ के चार रूप – जैसे चंद्रमा के चार चरण

1 अर्धकुंभ मेला
हर छह वर्षों में प्रकट होता है। यह वह भोर की किरण है, जो आत्मा के अंधकार को छूकर कहती है, “उठो, भीतर का सूर्य जागने वाला है।” हरिद्वार और प्रयागराज में जब यह मेला लगता है, तो वातावरण में ऐसा लगता है मानो देवगण स्वयं दीपक लेकर पृथ्वी पर उतर आए हों।

2 पूर्ण कुंभ मेला
बारह वर्षों का अंतराल, और फिर आस्था का महासंगम। यह वह क्षण है जब समय थम जाता है, जब हर सांस में मन्त्र गूंजता है, जब हर लहर में श्रद्धा बहती है। चारों स्थलों में से किसी एक पर जब यह आयोजन होता है, तो पूरा ब्रह्मांड मानो आरती की लौ बनकर झिलमिलाने लगता है।

3 महाकुंभ मेला
एक बार 144 वर्षों में, केवल प्रयागराज में। यह वह दृश्य है, जो केवल भाग्यशाली आत्माएँ देख पाती हैं, जब पृथ्वी स्वयं तीर्थ बन जाती है, और गंगा का जल मानो शिव के नेत्रों से टपकता अमृत हो। वह क्षण, जब हर कण में गूंज उठता है, “हर हर गंगे, हर हर महादेव…”


सनातन धर्म के लिए कुंभ मेला – केवल परंपरा नहीं, प्राण है

कुंभ मेला सनातन की आध्यात्मिक शिरा है। यह वह संगम है जहां श्रद्धा नदी बनती है, भक्ति उसका प्रवाह है, और ज्ञान उसका तट। यह वह क्षण है जब साधु-संतों के प्रवचन सूर्य की किरणों की तरह आत्मा के भीतर उतरते हैं, जहां हर शब्द, हर मन्त्र, हर आशीर्वाद आत्मा के भीतर दिव्यता का दीपक जलाता है।

जब कोई श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाता है, वह केवल जल में नहीं, बल्कि अपने भीतर उतरता है। हर डुबकी में वह अपने कर्मों की धूल को धोता है, अपने अहंकार को विसर्जित करता है, और शांति के उस तट पर पहुँचता है, जहां केवल एक ही आवाज़ होती है, “मैं वही हूँ जो सृष्टि का सार है।”

कुंभ मेला वह स्थान है जहां मौन बोलता है, जल गाता है, और आत्मा नाच उठती है। यह वह क्षण है जब भारत, केवल एक देश नहीं रहता, वह एक चलता-फिरता यज्ञशाला बन जाता है। हर व्यक्ति, हर संत, हर ज्योति, उसी परम सत्य की खोज में डूबा होता है।

यह मेला स्मृति है, देवों के युग की। यह मेला अनुभूति है, आत्मा के मोक्ष की। यह मेला प्रेरणा है, जीवन को पुनः पवित्र करने की।

और जब करोड़ों लोग एक साथ “हर हर गंगे” का उद्घोष करते हैं, तो लगता है, जैसे स्वयं अमृत मंथन का दृश्य पुनः जीवित हो उठा हो।


हर हर गंगे,
हर हर महादेव,

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