“जब मौन बोल उठता है – वही होती है पूजा” ?
पूजा क्या है
कभी आपने देखा है, जब कोई बालक पहली बार अपने पिता को प्रणाम करता है, उसके नन्हे हाथ काँपते हैं, आँखों में अजीब-सी श्रद्धा तैरती है, और वह समझ नहीं पाता कि “प्रणाम” का अर्थ क्या है, पर उसके भीतर से जो भाव उठता है, वही पूजा है।
पूजा का अर्थ केवल दीप जलाना नहीं, वह वह क्षण है जब आत्मा अपने स्रोत को पहचान लेती है।
जिसने हमें जीवन दिया, शरीर दिया, श्वास दी, वही जब हमारे भीतर उतरने लगता है, तब हमारे हाथ जुड़ जाते हैं, आँखें झुक जाती हैं, और मन मौन हो जाता है। यही मौन, सबसे ऊँची आरती है।
पूजा का सार
पूजा का अर्थ है, अपने पूज्य के प्रति सम्पूर्ण समर्पण।
जिसने यह ब्रह्मांड रचा, जो सूर्य की किरणों में स्पंदित है, जो धरती को संतुलित रखता है, जो हमें गुरु के चरणों तक ले गया, उस प्रति कृतज्ञता का नाम है पूजा।
यह केवल विधि नहीं, यह एक अनुभूति है।
जब भक्त अपने ईश्वर की मूर्ति के सम्मुख बैठता है, वह केवल आराधना नहीं करता, वह अपने भीतर की समस्त अशांति को नत कर देता है, मानो मन कह रहा हो, “प्रभु, अब सब आपका है।”
क्या पूजा केवल भगवान के सामने बैठकर ही की जा सकती है
परंतु प्रश्न उठता है, क्या पूजा केवल भगवान के सम्मुख बैठकर ही की जा सकती है?
उत्तर है, पूजा अनेक रूपों में होती है।
पंचोपचार, षोडशोपचार, योगाचार, भावाचार… ये सब उसी प्रेम के भिन्न-भिन्न छंद हैं।
जब हम पंचोपचार पूजन करते हैं, जल से स्नान, गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करते हैं, तब यह प्रतीक बन जाता है कि हम अपने जीवन की समस्त पवित्र वस्तुएँ अपने प्रभु को समर्पित कर रहे हैं। यह श्रीविग्रह का पूजन है, जहाँ मूर्ति हमारे भावों का दर्पण बन जाती है।
पूजा का व्यापक स्वरूप
परंतु पूजा केवल मूर्ति के आगे तक सीमित नहीं।
जब कोई साधक अपने खेत में हल चला रहा होता है और हर कण में “राम” को देखता है, वह भी पूजा है।
जब कोई माँ अपने बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए “हे भगवान, इसे सदा सुखी रखना” कहती है, वह भी पूजा है।
जब कोई साधक गंगा के तट पर बैठकर मौन में “हरि नाम” का स्मरण करता है, वह भी पूजा है।
क्योंकि जहाँ स्मरण है, वहाँ साक्षात् भगवान हैं।
श्रीविग्रह सेवा का महत्व
फिर भी, शास्त्र कहते हैं कि भगवत-सेवा का मूल आधार श्रीविग्रह की सेवा है।
क्योंकि श्रीविग्रह वह केंद्र है जहाँ भक्त का ध्यान ठहरता है।
वह केवल पत्थर नहीं, वह भाव का माध्यम है, उस हृदय का स्वरूप है जो भक्त के भीतर निवास करता है।
यदि हम भगवान की मूर्ति की सेवा किए बिना केवल बाहर पूजा करने लगें, तो वह बिना दीपक की आरती के समान है। प्रकाश तो होगा, पर दिशा नहीं।
इसलिए कहा गया, पूजा का प्रथम और श्रेष्ठ रूप वही है जो आराध्य के श्रीविग्रह के समक्ष की जाए।
समर्पण का रहस्य
जब भक्त दीप जलाता है, तो वह केवल तेल और बाती नहीं जलाता, वह अपनी अहंकार की परतें जला रहा होता है।
जब वह पुष्प अर्पित करता है, तो वह अपने हृदय का सबसे कोमल भाव रखता है प्रभु के चरणों में।
जब वह नैवेद्य रखता है, तो वह अपनी भूख, अपनी इच्छाएँ, अपनी आकांक्षाएँ सब समर्पित कर देता है।
यही है पूजा, समर्पण की वह कला जो हृदय को निर्मल कर देती है, और आत्मा को उसके स्वामी से मिलवा देती है।
पूजा का रहस्य
कभी मंदिर में दीपक की लौ को देखिए, जो बिना बोले कहती है,
“मैं जल रही हूँ, इसलिए उजाला है।”
यही पूजा का रहस्य है,
भक्त का जलना ही प्रभु का प्रसन्न होना है।