“जब प्रकाश स्वयं चल पड़ा अंधकार की खोज में – तब जन्म हुआ सद्गुरु का” ?
“मनुष्य का जन्म एक अधूरी पुस्तक की तरह होता है…और गुरु वह लेखक होता है जो उसके पन्नों को अर्थ देता है।” सच ही तो है – जीवन एक विशाल महासागर है।कभी शांत, कभी उफनता हुआ, और कभी दिशा हीन…पर जब तक कोई “नाविक” न मिले,यह सागर केवल भटकते लहरों का समंदर बनकर रह जाता…